Wednesday, February 9, 2011

अबे छोटू दो की तीन चाय ला


दोस्तों बात इसी बीते हुए जनवरी की है मेरा कुछ काम से अपने शहर से बहार जाने का प्लान बना .  जैसा की आपने अख़बारों मे पढ़ा होगा और शायद अपनी टी वी  स्क्रीन पर देखा होगा हमारे उत्तर प्रदेश मे ठण्ड के सभी रिकॉर्ड टूट गए थे , पूरे प्रदेश मे कड़ाके की ठण्ड थी सारा प्रदेश घने कोहरे और शीत लहर की चपेट मे था . पारा राजनेताओं की तरह नीचे गिरता जा रहा था वही ठण्ड से हुई मौतों का ग्राफ भ्रष्टाचार और घोटालों की तरह उपर जा रहा था . बहरहाल उस दिन मे सुबह 6  बजे के लगभग अपने शहर लखनऊ के मशहूर चारबाग रेलवे स्टेशन पहुँच गया  ठण्ड मुझे भी लग रही थी हाथ पैर मेरे भी काँप रहे थे अतः मैंने सोंचा " चलो क्यों ना एक चाय हो जाए और वैसे भी ठण्ड मे चाय पीने का अपना एक अलग ही आनंद है . " इसी तर्ज पर मैंने अपना बैग उठाया और आ गया बाहर, सामने ही चाय का ठेला था और मै चल दिया उस ठेले की ओर ठेले पर एक ओर ४ - ५  उम्र के आधे पड़ाव पार कर चुके बुद्दिजीविओं का समूह खड़ा था जो हाथ में अखबार के बिखरे पन्ने लिए हुए .चाय की चुस्कियों के बीच देश के हालात और प्रदेश में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर चर्चा कर रहा था , चूँकि मै उनसे ज्यादा दूर नहीं था उनके बगल में की खड़ा था उनकी परिचर्चा में बस एक श्रोता मात्र था कुछ देर तो उन लोगों की बातों को सुना फिर उस चाय वाले की तरफ इशारा करके बोला " भाई एक चाय देना उसने मेरी बात सुनी और वोह मेरी चाय बनाने में जुट गया , अच्छा चूँकि ठण्ड थी सो भीड़ होनी भी लाज़मी थी इतने मे मेरी ही उम्र के ३ नवयुवक वही पास की पान की दूकान पर रुके उन्होंने सिगरेट जलाई और फिर उन्ही मे से एक युवक कश भरते हुए बोला - " अबे छोटू दो की तीन चाय ला " जूठे गिलासों को धुलते हुए कोई ६ - ७ साल का मासूम जो शायद अब अपना असल नाम भी भूल गया हो ,एक कोने से बोला "जी भैय्या अभी लाया " इतने मे ही किसी ने मेरी स्वीटर की आस्तीन को खींचा नीचे देखा तो अपनी अधसोई आँखों से मुझे देखते हुए मुस्कुराता वही छोटू , और बोला ये लो साहेब आपकी चाय दोस्तों बड़ा ही प्यारा जीव था वो  छोटू "जीव " सिर्फ इसलिए कहूँगा की शायद हममे से कोई विरला ही हो जो उसे इंसान कहे - अधसोई आँखे ,मुस्कुराते हुए फटे होंठ . बिखरे हुए बाल सर्दी और धूल से पपड़ी पड़े गाल हड्डी विभेद्ती सर्दी मे मात्र एक गंद सा फटा स्वीटर पहने ,जिसमे हर ओर हवा अपना रास्ता बना रही थी एक उम्मीद एक आशा और हसरत भरी नज़रों से मुझे देखता वोह और दया और सहानुभूति लिए उसे देखता मै, अभी मैंने उसके सर्द हातों से गर्म चाय का गिलास पकड़ा ही था की उसके मालिक की आवाज़ आई " अबे मर गया क्या ? औरो को चाय क्या तेरा बाप देगा ,औरों को चाय दे ,वरना खाना नहीं मिलेगा आज तुझे " इतना सुनना था की उसकी जुगनूँ की तरह चमकती आँखे मानों पथरा सी गई माथे पर पड़े चिंता के बल साफ़ ये दर्शा रहे थे की कितने ज़ुल्मो सितम का सामना करना पड़ता होगा इस छोटू को , अभी मेरी चाय ख़तम ही होने वाली थी की प्लेटफोर्म  से आवाज़ आई यात्रिगन कृपया ध्यान दे ........... और मेरी ट्रेन आ गई थी स्टेशन पर . चाय को छोड़ मैंने ट्रेन मै एक खाली पड़ी सीट पर कब्ज़ा जमाया आँखे बंद करने की कोशिश की तो उसी छोटू का दुःख और मासूमियत भरा मुस्कुराता चेहरा और उस चेहरे पर सवाल करती आँखे मेरे सामने आईं  और मानों मुझसे ही वोह सवाल कर रही हो की आखिर मेरा कसूर क्या है ? मै अपनी मर्ज़ी से क्यों कुछ नहीं कर सकता ?......दोस्तों ये और इसके जैसे ना जाने कितने छोटू है जो हमारे आस पास है चाहे भयंकर गर्मी हो या कड़ाके की ठण्ड ये बेचारे जम कर मेहनत करते है और बदले मै मिलती है भद्दी गालियाँ मालिक की मार और दो टुकड़े रोटी के इनका अपना कोई नहीं है ना माँ बाप ना मालिक बस होता है इनका कुछ अपना तो खुला आसमान अपने ठेले पर जलने वाली भट्टी की राख खेलने के लिए कोयले के टुकड़े माचिस का डिब्बा , और अगर कोई दोस्त होता भी है तो वोह है उसी होटल के आस पास घूमने वाला बेजुबान कुत्ता जिसके साथ मिल बैठ के ये  अपने दुःख और अपनी रोटी बांटता है . मित्रो हम उसकी मुरझाई आँखों से गायब चमक को लौटा तो नहीं सकते है पर हाँ उस" छोटू " से प्यार के दो मीठे बोल तो बोल ही सकते है उसके बिखरे उलझे बालों मै अपने स्नेह का हाथ तो फेर सकते है चाय की चुस्की के बीच उसे मामूली हिसाब किताब तो सिखा ही सकते है ........ दोस्तों ज़िन्दगी का एक नियम है प्यार दो , प्यार लो उस छोटू को जीव ना समजकर उसे इंसान समझो कही इन सब से एक दिन इंसानियत ही ना शर्मसार हो जाए और वैसे भी किसी ने क्या खूब कहा है
मैंने दरिया से सीखी है पानी की परदा दारी
उपर उपर हँसते रहना , गहराई में  रो लेना
          डॉ बशीर बद्र