Wednesday, December 29, 2010

क्रिसमस की शाम .......................







प्यारे दोस्तों........... बात ज़यादा पुरानी नहीं है .


............ अभी महज़ चार ही दिन बीतें है बात है 25 दिसम्बर 2010  की वक़्त रहा होगा कोई रात का 9:45 क्रिसमस होने की वजह से मेरे बॉस(श्री अनुराग त्रिपाठी जी यू . पी  हेड न्यूज़ एक्स टी वी चैनल) ने  मुझको जल्दी छोड़ दिया था और मै भी और लोगों की ही तरह, क्रिसमस की शाम का मज़ा ले कर घर को लौट रहा था. जल्दी घर आने का ये सबब बिलकुल नहीं था की पिता जी की डांट पड़ेगी. या मेरी माँ मेरी फिक्र करेंगी, पर सिर्फ इसलिये की 25  दिसम्बर की  उस शाम को ठण्ड काफी थी. और मैने भी नौजवानी के जोश मे ज्यादा   कुछ पहना नहीं था . जैसे ही मै अपने शहर लखनऊ के मशहूर हजरतगंज चौराहे के करीब आया एक दृश्य को देखकर मै अन्दर से हिल गया, मेरे रोंगटे खड़े हो गए .जहाँ एक ओर पूरा शहर जशन मे डूबा था, हर आते जाते को मेरी क्रिसमस - मेरी क्रिसमस कर के बधाई दी जा  रही थी  वही इस जशन से बहुत दूर करीब एक 80 साल   का   बूडा इंसान मारे ठण्ड के करवटें बदल रहा था कभी वो दोनों पैरों को सीने से सटाकर गर्मी का एहसास लेता तो  कभी अपने हाथों से अपने सर को दबा लेता  अच्छा क्यूँकी शहर की भीड़ से थोडा दूर वोह एक कोने मे पड़ा सर्दी से जंग लड़ रहा था शीत लहर से दो चार हो रहा था उसके दांतों की किट- किट उस भीड़ भरे सन्नाटे को चीर सी रही थी . जब उससे रहा नहीं गया तो वोह वहां से उठा और न जाने कहाँ चला गया ............ चूँकि मैने अपने दोस्त को गाड़ी लेकर वही बुलाया था मेरा दोस्त भी  अपनी गाड़ी लेकर वहां आ गया . मैने एक बार फिर पीछे मुड के  देखा वोह आदमी भीड़ मे कही गुम हो गया था . मै  अपने दोस्त की गाड़ी पर बैठा और घर की ओर चल दिया जैसा की मैने आप लोगों को पहले ही बता दिया है की उस दिन ठण्ड काफी थी मै गाड़ी मै पीछे बैठा काँप रहा था और अपने दोस्त इमरान से जो आगे गाड़ी चला रहा था बोला भाई गाड़ी ज़रा धीरे चलाओ ठण्ड लग रही है वोह जोर से हंसा और गाड़ी को धीमा कर लिया तभी अचानक एक ख्याल मेरे दिमाग मै आया " एक नौजवान होने के नाते जब मुझको इतनी ठण्ड लग रही है तो उस बेचारे का क्या हाल हो रहा होगा मुझको तो घर जाकर माँ के हाथ की बनी हुई गरमा गरम चाय मिलेगी ओढने के लिहाज़ से कम्बल मिलेगा ........आखिर इस बेचारे का क्या होगा . कही ऐसा ना हो की  सुबह अखबार में  ये आये की "ठण्ड ने ले ली एक और जान"क्या वोह ज़िन्दगी और मौत की इस जंग मै मौत को शिकस्त दे देगा? क्या वोह इस सर्दी के बाद आई धूप का मज़ा ले लेगा?ये मै नहीं कह  सकता ये तो आने वाला वक़्त बताएगा  लेकिन हाँ मै उस परम पिता परमात्मा से यही प्रार्थना करूँगा की हे इश्वर उस आदमी को लम्बी उम्र दे ........... और हाँ दोस्तों अभी मै काफी हद तक इत्मेनान मै हूँ क्यूँकी अभी तक मैने अखबार मै ये नहीं पढ़ा की ठण्ड ने ले ली एक आदमी की जान या कुछ इस तरह का हुआ हो  ............ दोस्तों मैने लिख दिया और अपने पढ़ लिया मेरा मकसद यहाँ लिखना और आपको पढाना बिलकुल नहीं था मेरा मकसद ये था की  हम लोग एक ऐसे विषय पर अपनी संवेदना ज़ाहिर करें जिसे हमारा समाज लगातार नकार रहा है क्यों हम इत्ते खुदगर्ज़ हो गए है की मानवता को लगातार भूलते जा रहे है.दोस्तों सोंचो......... सोंचते जाओ   आज ये मेरे साथ हुआ है कल आप भी इस्से दो चार हो सकतें है अगर हम दिल से साफ़  होंगे तो खुद बा खुद हमारे दिल से निकलेगा मेरी क्रिसमस ...........तो दोस्तों अगर हम इन लोगों के लिए कुछ कर नहीं सकते तो कम से कम इनको अपने से दूर रखने का हक भी हमको बिलकुल नहीं है .आशा करता हूँ की शायद इस को पडने के बाद हमारे अन्दर सो चुकी संवेदना शायद एक बार जाग जाय ...........इसी आशा के साथ आपसी अलविदा लेता हूँ की आप इस विषेय पर चिंतन करेंगे .  
अच्छा दोस्तों अलविदा 

5 comments:

  1. Zindgi ki asliyat ko aap ne bhut he khoob likha hai aur yhi sachai bhi hai
    hum log bhaut hi khud garz ho gai hai kyo ki sachchai aaj is daur mai bahut
    hikam log likhte hai mai waqai aap ki baat sai ittefaaq rakhta hun ki
    hamarey dil mai chuppi samvedna kahi chup gai hai aaur aaj hamey sonchna
    hoga us ko bachana hoga :(

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  2. Hii bilal how r u aap ne bahut hi achcha likha hai nehin kya hoga ham padhane ke bad ise bhul jate hai...
    isaka samadhan bahut hi saral hai...bas in safed chor baiman rajnetaooo ko or sarakar ko samjhana hogo...ye.apni jara sa mamuli sa chori ka Rs. de de to bahut had tak garibe katam ho jayegaaaaaa.....

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  3. padh kar bahut acha laga ki kuch log aise bhi hai jinke dil me un besahara logon kie liye inti humdardi hai magar acha to tb hoga jb we"l do better 4 dem hope we can givemore luv n affection 2 dem!!!!! well said n written... ankita

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  4. A vry true n tchng piece f wrk 2 say d least...........well ,as far as ds pitiable truth f our society s cncerned.....d only irony is dat while ol f us wanna change d wrld ,no1 wants 2 change himself.....,v cannot put d whole blame on d gvt or any1 else.....its d society as a whole wch needs 2 cm 4wrd 2 deal wd ds situation......only sympathy or pity wont serve d purpose.....evn if each 1 f us cn put up a li'l effort n bring a li'l hope n2 d lyf f sm less 4tunate ones around us....a lot can b done.....n v dnt evn need 2 go 2 far 4 dt.......it cn b ne1 from ur housemaid 2 d nearby jhuggiwala....from ur rickshaw puller 2 a li'l boy whu wrks at a tea stall near you........,aftrol drop by drop v cn make n ocean.........ds reminds me f a couplet:
    LEKE DOOBA HAI HUME TAFARQA-E-RANG-O-NASAB,
    CHAHEY HUM KUCH BHI NA HOTE MAGAR INSAAN HOTEY
    ....Aiman

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  5. good to c dat u relli care n bother to write bout dese issues.thz time it ws really hard for every1 to bear winters. m imagining wat ws d state of dat man..!! may god bless him :)
    n yes would like to say dat..where ever u go..u olways keep ur eye on n observe dese things !! very nice :))

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